साथी




रातों को रात भर देखने की आदत हो गई थी इन नंगी आंखों को
जब तुम थे मिले
आंखें बंद.......बातें बंद,
सिर्फ सांसें सुनते थे हमदोनो सुबह तक.....फोन पर बेहिसाब।

सुबह का खाना
रात का भोज  सब बंद सा, जैसे तृप्त था मैं।

मिलन से पहले
बीते दिनों की अमावस की रात याद है मुझे,
कितनी काली होती थी ये-
जैसे मेरा रंग
मेरा ढंग
मेरा अंग
मेरी सुबह।

अब के जब तुम मिले हो
तो थोड़ा ठहरो
साथ बैठकर
रोक लो
मुझे भीड़ में भीड़ हो जाने से।

थोड़ी कोशिश तुम करो
थोड़ा मैं भी कर ही लूंगा
मान लेंगे उम्रदराज लोगों की बातें
ठंड की अनचाही बारिश में

कि
जब यहां तक रोक कर रखा है तुमने खुद को मेरे साथ,
तो सुनो
आज सालगिरह है हमारी
आज तो जाने की ज़िद ना करो।

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